लोकजीवन का यथार्थ चित्रण : दुष्यंत शर्मा
( हिंदुस्तान सिटी दिल्ली 9 जनवारी 2002 )
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रचना परिवेश से भी पनपती हैं l आसपास की मूर्त -अमूर्त चीजें भी तो रचना के लिए जमीन तैयार करती हैं l लिहाजा जिस लोक जीवन से संजू दास एक लम्बे समय तक लगातार जुडी रहीं वही उनके चित्रों में भी दिखाई देता है l जिस ग्रामीण पृष्टभूमि से उठकर और समझ हाशिल करके ये राजधानी में आ बसी हैं उनके चित्र उन्हीं दृश्यों ,परम्पराओं और जीवन का बयान करते हैं l स्त्री होने के नाते ,उनके रचना संसार में ग्रामीण महिलाएं ,उनके रोजमर्रा के कामकाज की छवियां जाहिर तोर पर अधिक हैं l किसी तरह की कल्पना या देखे को बदलने की सोच से उलट हैं उनके चित्र l यानी जो है सो है और वही सामने है l
संजू उत्तर पूर्व बिहार के मिथिलां नगर से ताल्लुक रखती हैं l वे कहती हैं "यहाँ की संस्कृति ने मुझे काफी प्रभावित किया है l इसीलिए शुरुआत मधुबनी कला से की l पर बाद में धीरे धीरे ,स्थनीय लीग ,परम्पराएं और असल जीवन कैनवास पर आने लगे l स्त्रियां ,बेटियां , स्थानीय रीति -रिवाज और खेलों के चित्र बनाना अच्छा लगने लगा l और आजकल यही चल रहा है l"प्रकृति अनेक कलाकारों को मोह लेती है l संजू के चित्रों में भी इसके बहुत रंग हैं l सूर्य ,भोर ,दुपहरिया ,साँझ,रात ,खेत ,बटबृक्ष के अलावा प्रकृति में रमनेवाले अनेक जीवों को भी उन्होंने अपने चित्रों में जगह दी है l जैसे चिड़ियों के बीच ,हाथी,आदमी और चिड़ियाँ ,चिड़ियाँ ,बाघ और मयूर l सभी चित्र सादगी और सहजता लिए हुए है l संजू एक महत्पूर्ण बात कहती तो हैं ही यह बात उनके चित्रों में भी नज़र आती है कि ग्रामीण स्त्री शहर में आकर , नए जीवन और चीजों से साक्षात्कार कर सुखद महशुश कर रही हैं l शोर -शराबा ,भीड़ -भाड़ ,चमक-दमक और ढेर से वाहनों के बीच व्यस्तता में जीने की जद्दोजहद गावं से शहर आ पहुंची या बसी महिला के लिए निस्संदेह एक अलग तरह का अनुभव है और वह इसमें जगह बनाना चाहती है lअभी उसकी नज़र नए परिवेश और वहां के जीवन पर है l संजू खुद कुछ सालों पहले दिल्ली के काफी करीब आ बसी हैं इसीलिए उनके दो एक चित्रों में ग्रामीण महिला का शहर से साक्षात्कार नज़र आ जाता है l ये चित्र स्त्री मुक्ति की पक्षधरता भी दर्शाता है l
दुष्यंत शर्मा
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